Monday, 18 March 2013

जहाँ आज भी

खुशमिजाजी के नगमे जहाँ रोज गाये जाते है .......
सदियों पुराने रीती रिवाज़ जहाँ आज भी निभाए जाते है......
जहाँ आज भी पत्थर की देवी सामान पूजा की जाती है....
जहाँ आज भी गृहणी स्वामी संग हल चलाती है.....
जहाँ देश की साठ प्रतिशत जनता बसर करती है...
जहाँ  माट्टी की खुशबु आज भी हर सुबह सहर करती है....
जहाँ आज भी ममता जैसी ठंडक है पेड़ों की छाँव में .....
दोस्तों ले आया हूँ में तुम्हे किसी एक गाँव में......
साधिनता की लार टपकती है जहाँ हवा की हर बहाव से ...
लज्जा की महक आती है स्त्री के स्वभाव से ..
जहाँ बचपन आज भी दादा दादी की गोद में गुज़रता है.....
पुरुष स्त्री के लिए जहाँ नदी किनारे  संवरता  है.....
भोलापन जहाँ हर मुस्कराहट में चमकता है....
साहस कुछ करने का हर आँखों में जलाकता है..
ये गाँव ये छाँव मेरे भारत की निशानी है......
गाँव ही रह गया है जहाँ आज भी बहता मीठा ठंडा पानी है..... !!!

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