Wednesday, 13 March 2013

ऐसा मेरा सुन्दर घर है

भोर भये जब उठती हूँनित नया सवेरा तकती हूँउगते सूरज की लालीहरे - हरे आमों की डालीझुरमुट के अंदर घुस-घुस करचिड़ियाँ चूं .. चूं करती हैंइस डाल से उस डाल पे इधर उधर गर्दन मटकातीजाने क्या बतियाती हैंचूं.. चूं...चूं.....चूं....चूं... चूं......जाने क्या क्या कहती हैंदाना चुगतीइक दूजे से भीड़ जाती हैंफिरमेरी खिड़की कीग्रिल परपंख फैला आ जाती हैंसमय हुआ तोएक एक करकेअपनी राह उड़ जाती हैंऔर फिरमेरे अंतर्मन कोखुशियों से भर जाती हैं .शाम हुएवापस आती हैंमिटटी में खूब नहाती हैंऔर कहीं पानी मिल जायेअपनी प्यास बुझती हैंदिनभर जैसे थक हार करघर में पंथी आता हैवर्षा ऋतू के तोक्या कहने?मोती की मालाकी लड़ियों में मानकों- सी एक इधर और एक उधरडाल -डाल जड़ जाती हैंऐसा मेरा सुन्दर घर है

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