आता है याद मुझे वो देश अपना!
सुबह की घंटी, चिड़ियों का चहकना ,
वो बैलों के गले की घंटी की रुनझुन,
वो बालाओं के पायल की छुनछुन,
आती है महक मुझे अदरक के चाय की,
बछड़ों की अटकल, रम्भाना गाय की,
बारिश के बाद आती वो सोंधी खुशबू
सफ़ेद पगड़ी में बैठे मुखिया बाबु,
पनघट पर जाती गाँव की गोरीयाँ,
सूखे धुल से नहाती वो छोटी गोरयाँ,
बच्चों की टोलियाँ का शोर,
गाता गरेडिया ले कर भेड़ों का होर,
सरसों के खेत की पीली चादर,
नाचते किसान देख के बादर,
कहीं पानी की पम्प की सुनाई देती फटफट,
माँ की नजरों से बच के भागना झटपट,
बसंत के मोसम की फूलों की बहार,
जनवरी से दिसम्बर तक मेलों का इंतज़ार,
घर आते ही दादा के झोले के टटोलना,
वो पुराने रेडियो के पार्ट-पुर्जे खोलना,
वो हासिये पे धार बनता लुहार,
वो रातों को चौकीदार की पुकार,
वो रातों में लैम्प में बैठ कर पढना,
घी चुपड़ी रोटियों का इंतज़ार करना,
दादी माँ से बालों को सहलवाना,
खुले आँगन में खटिये पे सो जाना,
आता है याद मुझे वो देश अपना,
हर एक पल हैं अनमोल, था वो समय अपना|
सुबह की घंटी, चिड़ियों का चहकना ,
वो बैलों के गले की घंटी की रुनझुन,
वो बालाओं के पायल की छुनछुन,
आती है महक मुझे अदरक के चाय की,
बछड़ों की अटकल, रम्भाना गाय की,
बारिश के बाद आती वो सोंधी खुशबू
सफ़ेद पगड़ी में बैठे मुखिया बाबु,
पनघट पर जाती गाँव की गोरीयाँ,
सूखे धुल से नहाती वो छोटी गोरयाँ,
बच्चों की टोलियाँ का शोर,
गाता गरेडिया ले कर भेड़ों का होर,
सरसों के खेत की पीली चादर,
नाचते किसान देख के बादर,
कहीं पानी की पम्प की सुनाई देती फटफट,
माँ की नजरों से बच के भागना झटपट,
बसंत के मोसम की फूलों की बहार,
जनवरी से दिसम्बर तक मेलों का इंतज़ार,
घर आते ही दादा के झोले के टटोलना,
वो पुराने रेडियो के पार्ट-पुर्जे खोलना,
वो हासिये पे धार बनता लुहार,
वो रातों को चौकीदार की पुकार,
वो रातों में लैम्प में बैठ कर पढना,
घी चुपड़ी रोटियों का इंतज़ार करना,
दादी माँ से बालों को सहलवाना,
खुले आँगन में खटिये पे सो जाना,
आता है याद मुझे वो देश अपना,
हर एक पल हैं अनमोल, था वो समय अपना|
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