Thursday, 12 July 2012

एक आम आदमी हूँ मैं

एक आम आदमी हूँ मैं
कभी गिरता हुआ, कभी संभलता हुआ
कभी चलता हुआ, कभी रुकता हुआ
कभी रोते, कभी गाते
कभी ग़मों को गुनगुनाते
सड़क से गुजरता हुआ
गलियों से चलकर
संघर्ष से छनकर
कदम दर कदम
अपनी रोजी-रोटी की तलाश में
कभी गाँव, कभी शहर
कभी नगर, कभी महानगर
की ख़ाक छानकर सुकून के दो वात्क्त के जुगाड़ में
कभी महलों के दरवाजों पर
कभी राजपथ के मंदिरों के
बाहर दस्तक देता
एक आम आदमी हूँ मैं
कभी चौराहे पर
कभी बाज़ार में
खुद की बोली लगाने वाला
कभी हालत का मारा हुआ
कभी समय से हारा हुआ
कभी महंगाई के बोझ तले पिसता हुआ
कभी अपने नसीब को पथ्थरों पर घिसता हुआ
धुप के ताप से बचने के लिए
एक अदद आशियाने की तलाश में
इस घर से, उस घर के
चक्कर लगाने वाला
एक आम आदमी हूँ मैं
कभी रोटी के लिए
कभी छोटी के लिए
कभी बगावत के लिए
कभी चाहत के लिए
कभी माँ की दवाई के लिए
कभी बहिन की विदाई के लिए
कभी मिलों में
कभी मंत्रियों के किलों में
अपनी ईमानदारी के पोछे से
बाबुओं के लहू की प्यास उझाने वाला
एक आम आदमी हूँ मैं!

ऐसा अनूठा और आलौकित है मेरा गाँव.

सुनहरी धुप मैं, अनूठी रात मैं,
जहाँ तारे धरा पर आते हैं,
जहाँ बदल फुल बरसते हैं,
जहाँ की हर बात निराली है,
जहाँ की मिटटी थंधक देने वाली है,
जहाँ नदियों का गीत है,
जहाँ बागों में कोयल का संगीत है,
जहाँ धुप में भी लगे है मुझे छाँव,
ऐसा अनूठा और अलौकिक है मेरा गाँव.
जहाँ बाग़ में बालाएं अठखेली करती हैं,
जहाँ दादी हर सुबह रामायण का पाठ पद्धति है,
जहाँ के हर सुबह में मंदिर के शंख की आवाज़ है,
जहाँ हर शाम को मस्जिद में खुदा का अलग अंदाज़ है,
जहाँ दादाजी के पैरों में आज भी शोभे खराँव,
ऐसा अनूठा और अलौकिक है मेरा गाँव.
जहाँ के स्त्रियों के चेहरे पर आज भी लाज की गरिमा भाति है,
जहाँ के पुरुषों को आज भी, शर्मों-हया में लिपटी नारी ही लुभाती है,
जहाँ एक-दुसरे की सहायता को लोग तत्पर रहते हैं,
जहाँ अतिथि को लोग आज भी देवता कहते हैं,
अब अपने गाँव के बारे में क्या तुम्हें में बताऊँ,
लिखूं कोई कविता या गीत कोई गाऊं,
जहाँ चौपाल पे तन को थंधक देती है आज भी पीपल छाँव,
ऐसा अनूठा और आलौकित है मेरा गाँव.

मेरा गाँव मेरा देश!!!

आता है याद मुझे वो देश अपना!
सुबह की घंटी, चिड़ियों का चहकना ,
वो बैलों के गले की घंटी की रुनझुन,
वो बालाओं के पायल की छुनछुन,
आती है महक मुझे अदरक के चाय की,
बछड़ों की अटकल, रम्भाना गाय की,
बारिश के बाद आती वो सोंधी खुशबू
सफ़ेद पगड़ी में बैठे मुखिया बाबु,
पनघट पर जाती गाँव की गोरीयाँ,
सूखे धुल से नहाती वो छोटी गोरयाँ,
बच्चों की टोलियाँ का शोर,
गाता गरेडिया ले कर भेड़ों का होर,
सरसों के खेत की पीली चादर,
नाचते किसान देख के बादर,
कहीं पानी की पम्प की सुनाई देती फटफट,
माँ की नजरों से बच के भागना झटपट,
बसंत के मोसम की फूलों की बहार,
जनवरी से दिसम्बर तक मेलों का इंतज़ार,
घर आते ही दादा के झोले के टटोलना,
वो पुराने रेडियो के पार्ट-पुर्जे खोलना,
वो हासिये पे धार बनता लुहार,
वो रातों को चौकीदार  की पुकार,
वो रातों में लैम्प में बैठ कर पढना,
घी चुपड़ी रोटियों का इंतज़ार करना,
दादी माँ से बालों को सहलवाना,
खुले आँगन में खटिये पे सो जाना,
आता है याद मुझे वो देश अपना,
हर एक पल हैं अनमोल, था वो समय अपना|

तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है....

तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है....

मेरा गाँव, गाँव का नाम सुनते ही न जाने कितनी ही स्मृतिया एक के बाद एक मानस पटल पर क्रिड्रा करने लगती है। पुराना मकान, सीढीनुमा हरे भरे खेत
बड़ा भोला बड़ा सादा बड़ा सच्चा है
तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है
वहां मैं मेरे बाप के नाम से जाना जाता हूँ
और यहाँ मकान नंबर से पहचाना जाता हूँ
वहां फटे कपड़ो में भी तन को ढापा जाता है
यहाँ खुले बदन पे टैटू छापा जाता है...
यहाँ कोठी है बंगले है और कार है
वहां परिवार है और संस्कार है
यहाँ चीखो की आवाजे दीवारों से टकराती है
वहां दुसरो की सिसकिया भी सुनी जाती है...
यहाँ शोर शराबे में मैं कही खो जाता हूँ
वहां टूटी खटिया पर भी आराम से सो जाता हूँ
यहाँ रात को बहार निकलने में दहशत है
वहां रात में भी बहार घुमने की आदत है
यहाँ मिस्टर कालीचरण कह कर बुलाते है
वहां कल्लू काका कह कर चरणों में शीश झुकाते है
मत समझो कम हमें की हम गाँव से आये है
तेरे शहर के बाज़ार मेरे गाँव ने ही सजाये है
वह इज्जत में सर सूरज की तरह ढलते है
चल आज हम उसी गाँव में चलते है.............
उसी गाँव में चलते है
लेखक- अज्ञात